टन... टन... टन... टन... कांसे की थाली बजी।
“बधाई द्योजी !! सेठां लादूरामजी क पेलो पोतो हुयो ह...!!”
खबर बिजली की तरह जसवन्तगढ़ गांव में फैल गयी। सेठ लादूरामजी का पहला पोता, और वह भी तीन बेटियों के बाद!! इस सुसंवाद को सुनकर गांव का कौन शख्स रुकता?
दादा लादूरामजी आगन्तुकों को बधाई बांटने में व्यस्त थे। पिता हणमानबगसजी मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। यही उनकी खुशी का इज़हार होता था। खुलकर हंसना उनके स्वभाव में नहीं था।
संवत 1985 आश्विनशुक्ल की दशमी अर्थात् 24 अक्टूबर 1928 की रात थी यह। जब घड़ी के कांटे दो बजे के आगे पांच मिनट पर पहुंचे, दादा लादूराम जी के कुल में दो पुत्रियों के बाद, यह पहला कुलभूषण अवतरित हुआ। कौन जानता था कि “जापाघर” यानि 10 बाइ 7 फुट के, सन् 1928 के घरेलू मैटर्निटी क्लीनिक में बड़ी बहू रामप्यारी देवी ने आज जिस बच्चे को जन्म दिया है, उसे सिर पर स्वयं विधाता ने हाथ फेर कर धरा पर भेजा है। सिर्फ भाग्य ही जानता था कि सदाचार, कर्मठता और नेतृत्व की एक अविश्वसनीय कहानी का पहला पृष्ठ आज लिखा जा रहा है।
पण्डितजी ने ज्योतिषशास्त्र के अनुसार नवजात शिशु की कुण्डली बनाकर वे अक्षर बताए, जिनसे शुरू होने वाला नाम रखा जाना था। संभावित नामों में से दादा लादूराम जी को “श्रीराम” नाम सबसे अधिक जंचा। श्रीराम के बाद छः भाई और चार बहनों का जन्म हुआ। यानि प्यारीदेवी (रामप्यारी का बोलचाल का नाम) तेरह संतानों की माता बनीं। इनमें से दो बेटियों को जन्म के कुछ ही दिनों बाद ईश्वर ने अपने पास वापस बुला लिया।
पहले पोते का उपहार पा कर दादी सुरजू देवी की खुशियों का ठिकाना न था। नवजात को पौष्टिक प्राकृतिक दूध भरपूर मिले, इसके लिये माता को गोंद, अजवाइन, सौंठ, गुड़ और अनेक बलवर्धक जड़ी-बूटियों वाले तरह-तरह के खाद्य पदार्थ बना कर खिलाए जा रहे थे। भारतीय परिवारों में अनुभव और ज्ञान की संचित धरोहर इसी तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होती जाती है। ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन सिर्फ “जापायती” को ही नसीब होते थे। गर्भावस्था व जापे के कष्ट के बाद स्वास्थ्यकारी अनूठा भोजन और विशेष देखभाल, एक तरह का ‘कांसोलेशन प्राइज़’ ही तो थे।
ज्योतिष के गहन ज्ञाता लादूराम जी को यह पहले से पता था। उन्होंने चांदारूण गांव के रामचन्द्रजी तोतला की बेटी रामप्यारी को अपने बड़े बेटे “हणमाना” के लिए इसीलिये पसन्द कर लिया था क्योंकि उन्हें उसकी कुण्डली में साफ नजर आ गया था कि यह पुत्र-पुत्रियों की क्रिकेट टीम जितनी लम्बी कतार बनाने की क्षमता रखती है। शानदार भविष्य की नींव पड़ चुकी थी।
तभी पीहर चांदारूण से बेटी रामप्यारी को बुलावा आया और वह दो-चार महीने के शिशु श्रीराम को लेकर पीहर गयी। पीहर का सबसे बड़ा आकर्षण यह होता था कि बेटी शिशु को अपनी मां यानि नानी को सौंप कर खूब सो सकती थी। एक तरह से यह ‘ऑफ ड्यूटी’ होने का सुख था। पर इस बार यह कल्पित सुख बहुत भारी पड़ा। उन्हीं दिनों गांव में “बड़ी माता” यानि
चेचक का प्रकोप फैल गया। इसकी चपेट में श्रीराम आ गया। प्रकोप भी इतना जबरदस्त कि सारे शरीर में कोई जगह नहीं बची, जहां फफोला न हो। आंखें तक पूरी तरह ढंक गईं। उस जमाने में चेचक का कोई वैद्यकीय या डॉक्टरी इलाज़ नहीं था। गधे की सूखी लीद की धूनी लगाना, मोरपंख से खाज को सहलाना और झाड़ा देना – इस तरह के पारम्परिक इलाज ही थे। चिकित्सा विज्ञान बहुत उन्नत न था। अशिक्षा और अंधविश्वास जैसे कारण तो थे ही। स्वाभाविक है कि लोगों के लिए भगवान की कृपा की बाट जोहने के सिवा दूसरा चारा न था। सबसे विश्वसनीय इलाज़ था, ‘शीतला माता की मनौती”। विश्वास-अंधविश्वास का यह अजीब उदाहरण था कि चेचक की देवी से ही जीवन की याचना की जाती थी।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि प्राण बचाने के लिए की जाने वाली मनौती जितनी कठिन और जानलेवा होगी, शीतला माता उतनी प्रसन्न होंगी और दया करेंगी. इसी आस्था के साथ नानीजी ने ‘जात’ बोली कि वे भर दोपहरी, सिर पर जलते अंगारों की सिगड़ी रखकर, अढ़ाई किलोमीटर दूर शीतलामाता के मन्दिर तक नंगे पांव चल कर जाएंगी और दर्शन-पूजा करेंगी। माता प्यारीदेवी ने मनौती मानी कि वह ‘अमरकुण्डाळो’ की पूजा हर साल जीवन भर करेंगी। इस पूजा में ९ दीये जलाए जाते हैं। मां प्यारीदेवी ने अपनी मनौती को जीवन भर निभाया। --- वर्ष की उम्र की अशक्तता के बाद उन्होंने इस मनौती को अपनी बहू यानि श्रीराम जी की पत्नी सुमनदेवी को जारी रखने के लिये कहा और उन्होंने भी इसे निभाया। शायद इस मनौती ने ही श्रीरामजी के जीवन की रक्षा ८६ वर्ष तक की।
इस जानलेवा विपत्ति पर एक और कुठाराघात हुआ। जैसे ही सेठ लादूरामजी को अपने पोते श्रीराम को ‘माता उपड़ने’ की खबर मिली, वे आपे से बाहर हो गये। तापड़िया परिवार के भावी कर्णधार के जीवन को खतरे में डालने का दोष पूरे तोतला परिवार का ही माना गया। दादाजी ने नानाजी को अल्टीमेटम दे दिया ‘जे म्हारा टाबर क की हूयग्यो तो देख लीज्यो पछ मं काईं करूंलो’। पूरा तोतला परिवार दहल गया। तापड़िया परिवार की अमूल्य धरोहर की जान बचाने में पूरा तोतला परिवार लग गया। पर वे कर भी क्या कर सकते थे ? प्यारीदेवी पर क्या बीती होगी? दिन-रात जाग कर शिशु की देखभाल और शीतला माता से प्रार्थना !! खुद की जान की परवाह करने की फुरसत ही कहां थी और परवाह भी किसको थी?
पर एक माँ के हृदय की गहराई से उठी करुण पुकार को शीतला माता ने सुन लिया। जहां चेचक से गांव के गांव साफ हो रहे थे, वहां जच्चा व बच्चा दोनों सकुशल जसवन्तगढ़ पहुंच गये। लादूरामजी को अपना रौद्र रूप दिखाना नहीं पड़ा।
श्रीरामजी का बचपन जो जसवन्तगढ़ की गलियों में गुज़रा वह उनकी रग-रग में मातृभूमि के प्रति अगाध प्यार को भर गया।
यह तापड़िया परिवार के आर्थिक स्वर्णिम काल का उदय था। दादाजी लादूरामजी ने कलकत्ते में कपड़े के कामकाज़ को तेजी से बढ़ाया। अपने तीनों छोटे भाइयों को भी व्यापार में स्थापित किया। स्वयं पाठशाला नहीं जा सके पर शिक्षा के महत्व को वे पूरा जान चुके थे। जसवन्तगढ़ में आगे की पढ़ाई उपलब्ध नहीं थी इसलिये श्रीरामजी को पढ़ाई के लिये कलकत्ते में रखा गया।
आज के न्यूक्लियर परिवार में जन्मे युवाओं को उन दिनों के संयुक्त परिवार (जॉइन्ट फैमिली) के तौरतरीकों को समझना कठिन है। बच्चों की देखरेख जॉइन्टली होती थी। मां बाप ही अपने बच्चों की देखरेख करें, यह बिलकुल आवश्यक नहीं था।
सारे बच्चों के काम होलसेल में मास प्रोडक्शन बेसिस पर होते थे। कोई सबको नहला रही है, कोई सबको खाना खिला रही है, कोई छड़ी लेकर सबको पढ़ा रही है, कोई सबको सुला रही है। इसी सिलसिले में बच्चा अपने मां बाप से दूर काका, बाबा, बड़े भाई, मामा, नाना किसी के भी संरक्षण में, कहीं भी भेज दिया जाता था। वहां वह नखरे नहीं कर सकता था जो मां के सामने बच्चा किया करता है। बड़ों की ऑथोरिटी अनक्वश्चन्ड होती थी। संरक्षक दूसरों के बच्चे को भी पीट सकता था और अपनत्व के साथ पीटता भी था। इस प्रकार वह बच्चा एक तरफ सहनशीलता और एडजस्टमेन्ट का अमूल्य पाठ पढ़ता था और दूसरी तरफ पूरे संयुक्त परिवार को अपना अटूट परिवार मानना उसकी रगों में आ जाता था। दादाजी लादूरामजी सबके लिये पितामह की तरह थे जिनसे सब डर से कांपते भी थे और दिल की गहराई में आदर भी रखते थे। सब बड़ों व बच्चों के लिये अन्तिम निर्णय उनका ही होता था। श्रीरामजी भी उसी संस्कृति में पले-बढ़े।
दादाजी लादूरामजी के विचारों और संस्कारों को उन्होंने जितना आत्मसात किया, उतना किसी अन्य ने नहीं किया। उन्होंने कलकत्ते में माहेश्वरी विद्यालय से हाईस्कूल पास किया। फिर बी. ए. के लिये स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया।
ट्यूशन की परम्परा थी। संस्कृत भाषा में हमारी संस्कृति छिपी है, यह दादाजी समझ चुके थे। इसलिये सभी बच्चों के लिये संस्कृत का एक अध्यापक खोजा गया। वे थे, प्रकाण्ड विद्वान श्री रमाकान्तजी उपाध्याय। वे सब तरह से योग्य थे पर दादाजी को उनमें एक खतरा दिखा। उपाध्याय जी आर्यसमाज के वरिष्ठ उपदेशक थे। दादाजी थे, घोर सनातनधर्मी। चोर को ही चौकीदार बनाने की नीति उन्होंने अपनाई। पण्डितजी पर बड़ा विश्वास जताते हुए उन्होंने अपनी चिन्ता बताई, ‘पण्डितजी, इन दिनों आर्यसमाज की बड़ी हवा चल रही है। आप ध्यान रखना कि बच्चे कहीं आर्यसमाजी न बन जायें।’
पर होनी तो होकर रहती है। दादाजी को भी क्या मालूम था कि इस ट्यूशन का साइड इफेक्ट क्या होगा और यह ट्यूशन तापड़िया परिवार में भारतीय संस्कृति का कितना गहरा बीज बो देगी जिसका असर पीढ़ी दर पीढ़ी रहेगा। हुआ यह कि संस्कृत भाषा की पढ़ाई तो हुई ही पर साथ ही श्री रमाकान्तजी उपाध्याय ने चरित्रनिर्माण, स्वास्थ्य-जागरूकता, व्यवहारकुशलता, सरलता, सादगी, निरहंकारिता, परोपकारिता, देशभक्ति आदि के संस्कार उस पीढ़ी के सभी किशोरों व युवाओं में रोप दिए, जो वहां संयुक्त परिवार में पल रहे थे। किसी में कम, किसी में अधिक। श्रीरामजी ने उन्हें पूरा आत्मसात किया। इसी का फल रहा कि लक्ष्मी की कृपा से सम्पत्तिवान हो जाने पर भी, तापड़िया परिवार उन बुराइयों से आज तक बचा हुआ है, जो अनेक परिवारों को डंस लेती हैं। आज इस परिवार की समाज में इतनी अधिक जो प्रतिष्ठा है, उसका बड़ा श्रेय दादाजी के इस एक कार्य को है। पूज्य रमाकान्तजी के एहसान से तो परिवार कभी उऋण हो ही नहीं सकता।
अब आगे की गाथा में आपको श्रीरामजी नाम के बजाय भाईजी नाम पढ़ने को मिलेगा क्योंकि आगे चलकर परिवार ही नहीं, बल्कि सारा माहेश्वरी समाज उन्हें स्नेह-आदर से भाईजी बोलकर ही सम्बोधित करता रहा था और आज भी कर रहा है। बीए की पढाई पूरी करके भाईजी, दादाजी लादूरामजी के अधीन, घर के व्यवसाय में जुड़े। घर का व्यवसाय यानि कपड़े का कामकाज। दादाजी ने कपड़े के कामकाज को कैसे विशाल रूप दिया, इसकी कहानी भी बड़ी रोचक व प्रेरणादायी है, जो आप आगे पढ़ेंगे।
दादाजी ने सबसे पहले तो अपने भाइयों को कलकत्ता बुला कर कपड़े के व्यापार में स्थापित किया। पहले साथ में और फिर स्वतन्त्र रूप से। इसके बाद उनके बेटे और फिर पोते एक-एक कर के व्यापार में कलकत्ता आ गये। दादाजी में प्यार और अनुशासन का अद्भुत बैलेंस था। उनके व्यक्तित्व और धाक के प्रभाव से न तो कोई व्यसन आदि में बिगड़ा, न विलासिता की तरफ झुका और न आपस में झगड़े की प्रवृत्ति पनपी। कब कहां कितनी छूट देनी है और कब लगाम खींचनी है- दादाजी के पास इसका अनुपम ज्ञान था।
भाईजी १५ साल के हो गये तो ‘ब्यावमान’ यानि ‘फिट फॉर मैरेज’ हो गये। तो सम्बन्ध देखने की शुरूआत हुई। उस जमाने में विवाह लड़के-लड़की का कम, दो परिवारों का सम्बन्ध ज्यादा होता था। लड़का-लड़की तो अबोध बच्चे होते थे। तो उनके गुण-स्वभाव कैसे जाने जाएं? उसके दो तरीके थे। एक तो परिवार की समाज में प्रतिष्ठा, धर्मपरायणता और परिवार के मुखिया के स्वभाव और विचार-योग्यता से यह साइन्टिफिक कनक्लूजन निकाला जाता था कि आगे चलकर उस विवाह योग्य लड़के या लड़की का स्वभाव और विचार-योग्यता कैसी होगी। पेडिग्री का विज्ञान पूरा था। दूसरा तरीका यह कि कुण्डली-मिलान किया जाता था। दादाजी ज्योतिष के अद्भुत ज्ञाता थे। कुण्डली से सारा चित्र सामने आ जाता था कि दाम्पत्यसुख, स्वास्थ्यसुख सन्तानसुख क्या लिखा है। तापड़िया हवेली के पीछे श्री जसवन्तमलजी मूंदड़ा रहते थे जो मूलतः डीडवाना के थे। उन्होंने अपनी भतीजी डीडवाना के सेठ श्री लक्ष्मीनारायणजी मूंदड़ा की कन्या ‘गोदावरी’ का प्रस्ताव दादाजी के सामने रखा। यह प्रस्ताव दादाजी की दोनों जाँचों में पास हो रहा था।
कन्या व घराने को देखकर सम्बन्ध पक्का करने के लिये दादाजी ने छोटे दादाजी गणपतरायजी, काकाजी जीवणमलजी, काकाजी कन्हैयालालजी और काकाजी जीतमलजी की कमिटी को अधिकार देकर भेजा। श्रीरामजी के पिताजी हणमानबगसजी को भी नहीं भेजा गया तो श्रीराम के जाने का तो सवाल ही कहां था! कन्या सामने आकर बैठ गयी। सवाल पूछा गया ‘गीता आव ह के?’ (गीता आती है क्या?) ९ वर्ष की कन्या ने हां में सिर हिला दिया। और अधिक क्या जानना था? कमिटी को कन्या व घराना दोनों सम्बन्ध करने लायक लगे और वहीं कन्या को बींटी (अंगूठी) पहना कर ‘नेग’ कर दिया गया। रिश्ता पक्का हो गया।
इस निर्णय में श्रीराम के पिता हणमानबगसजी और श्रीराम की माँ रामप्यारीदेवी को या पोते श्रीराम को खुद को पूछने का या उसे लड़की दिखाने या मिलाने का तो कोई सवाल ही नहीं था। कई कारणों से और सर्वोत्तम मुहूर्त के हिसाब से विवाह २.५ साल बाद करने का तय रहा। इस बीच भावी पति-पत्नी ने न एक दूसरे को देखा, न चिट्ठी लिखी। फोन तो था ही नहीं।
विवाह की तैयारी दोनों तरफ धूमधाम से हुई। आजकल की तरह लड़की वालों को नहीं बुलाया जाता था। लड़के की १५० से ३०० जनों की बारात जाती थी जिसमें पूरे परिवार के पुरुष व लड़के, सगे-सम्बन्धी, पूरे गांव के परिचित मित्र और पण्डित नौकर नाई जाते थे। महिलायें नहीं जाती थीं। नारागाड़ी ( बैलगाड़ी ), भैंसागाड़ी, ऊँटगाड़ी आदि का पूरा काफिला होता था। पहले ‘’बनड़ा’ (दूल्हा) और फिर ‘बीनराजा’ के टाइटल से युक्त और ललाट पर पट्टा, साफा बागा तलवार से सुसज्जित श्रीराम को लेकर बैण्डबाजा बजाती तापड़िया परिवार की ४०० जनों की मोडेस्ट बारात डीडवाना पहुंची। बारात की जबरदस्त आवभगत हुई यानि खूब मनुहार कर-कर के इतनी बार खिलाना-पिलाना हुआ कि बारातियों को जिन्दगी भर याद रहा। सिर्फ ४ दिन की आवभगत का आनन्द लेकर विवाह सम्पन्न कर वधू को लेकर बारात वापिस आयी। आगे चलकर भाईजी को गोदावरी नाम पसन्द नहीं आया इसलिये नाम बदलकर सुमन रख दिया।
उस समय बम्बई कपड़ा निर्माण का बड़ा केन्द्र था। सारे भारत में वहीं से कपड़ा वितरित होता था। तापड़िया परिवार भी वहीं से, मिलों से, दलालों के माध्यम से खरीदकर मंगाता था। दादाजी को लगा कि परिवार का एक सदस्य यदि बम्बई रह कर माल भिजवाये तो हम जीत में रहेंगे। भाईजी की योग्यता को देखकर उनको बम्बई शिफ्ट होने का आदेश हुआ। बम्बई में शेख मेमन स्ट्रीट जवेरी बाजार में पगड़ी पर जगह ली। आगे ऑफिस जिसको गद्दी या पेड़ी कहा जाता था और पीछे रहने की ‘खोली’। वहीं ‘बासा’ यानि पेड़ी के सारे मुनीम, गुमाश्तों व मालिकों के लिये भोजनालय। पेड़ी में मुनीम सुबह से देर शाम तक गद्दे पर पालथी मार कर बैठे सामने एक बड़े तकिये पर बही खाता लिखते थे। रात को उसी गद्दी पर सारे मुनीम लाइन से सो जाते थे और एक कॉमन बाथरूम से काम चलाते थे।
बम्बई आने का फायदा सबको नज़र में आया होगा। अतः धीरे-धीरे जो सारा तापड़िया परिवार कलकत्ते में बसा था वह करीब-करीब सारा बम्बई आकर रहने लगा। पहले जवेरी बाजार में और पेड़ियां खुली। फिर धीरे-धीरे रहने की जगह अलग हुई। पहले मरीन ड्राइव, फिर नेपियन सी रोड फिर और जगह। परिवार भी तेजी से बढ़ रहा था। दादाजी के बेटों की पीढ़ी के हर सदस्य ने ५ से लेकर १३ तक वंशवृद्धि की। कामकाज जो एक समय चारों दादाजी का साथ में था, वह भी अलग-अलग हो गया। कपड़े के व्यापार ने सबको काफी सम्पन्न बना दिया और उसके अनुसार रहने का स्तर भी बढ़ा जो कि लादूरामजी की विचारधारा के विपरीत था पर उन्होंने समय के अनुसार नयी पीढ़ी को कुछ छूट दे दी। यह परिवार का आर्थिक स्वर्णिम काल था।
बम्बई आकर भाईजी को लगा कि कानून की जानकारी बहुत उपयोगी है। सो कामकाज देखने के साथ उन्होंने सुबह के विल्सन कॉलेज चौपाटी में दाखिला लेकर एल एल बी किया।
दादाजी के पीछे परिवार के सारे ही सदस्य जसवन्तगढ़ गांव छोड़कर कलकत्ते आ गये। मेहनत और सूझबूझ के कारण व्यापार दिन दूना रात चौगुना बढने लगा। ऐसा नहीं कि कम्पिटीशन नहीं था। सुना था कि जरूरत पड़ने पर खरीद मोल पर भी माल आगे बेच देते थे। कपड़े की गांठ जो खोली, उसके बारदान को बेच लिया, वही नफा था। कपड़े का काम काफी बढ़ गया तो यह प्रस्ताव आया कि जब सारा माल बम्बई से खरीदा जा रहा है तो परिवार का एक सदस्य बम्बई जाकर रहना चाहिये। दादाजी ने भाईजी को इसके लिये उपयुक्त समझा और सन् १९५० में भाईजी बम्बई निवासी बन गये। जवेरी बाजार में एक पेढ़ी की जगह पगड़ी पर ली। किफायत का जमाना था और उसी के कारण कमाई थी। सो पेढ़ी के आगे के हिस्से में कामकाज चलता और पीछे के हिस्से में भाईजी भोजाईजी रहते थे। मुनीम लोग काम की जगह ही सोते थे और सबके लिये चौका एक ही था। कई जनों के बीच बाथरूम भी एक ही था। फिर भी दादाजी के विचार में भाईजी जरूरत से ज्यादा खर्चीले थे इसलिये वे भाईजी के खर्च पर अपने तरीके से कन्ट्रोल करते रहते थे। यह सही भी था कि बम्बई में जो आमोद प्रमोद के साधन थे, उनका सीमित रूप में उपभोग भाईजी करते भी थे। बस ट्राम से आना-जाना था। जवेरी बाजार में ही छोटे दादाजी के परिवार ने भी भाईजी की मदद से पेढ़ी ले ली थी और वहीं रहते थे। काका-भतीजे साथ ही सुख-दुख बांटते थे, सिनेमा पिकनिक जाते थे, ताश खेलते थे।
बम्बई में काम बढ़ता गया और परिवार के सदस्य भी एक एक कर कलकत्ते से बम्बई शिफ्ट होते गये। इसलिये दादाजी की अनुमति से रहने की जगह अलग ली गयी। उस समय के प्रतिष्ठित एरिया मरीनड्राइव में कल्पना बिल्डिंग में ५०,००० रु में फ्लैट खरीदा गया। उसमें फर्निशिंग के लिये सुमन भोजाईजी ने बड़ी किफायत से १०,००० रु में सारा फर्नीचर खरीदा।
जैसे जैसे हनुमानबगसजी परिवार के सदस्य बढते गये, क्रमश: कल्पना बिल्डिंग से शिवप्रसाद बिल्डिंग और शिवप्रसाद बिल्डिंग से निम्फ बिल्डिंग शिफ्ट हो गये। एक ऐसा भी विलक्षण समय था, जब पूरे हणमानबगसजी तापडिया परिवार के करीब ४० सदस्य एक ही रसोई में भोजन करते थे। यह भाईजी की नेतृत्वक्षमता और परिवार को बांधकर रखने की क्षमता का अप्रतिम उदाहरण था।
एक अवधि तक पूरा व्यापार कपड़े का ही था। उसमें कमाई भी अच्छी हो रही थी। क्रिकेट के जुनून के कारण भाईजी सीसीआई के सदस्य बने। उससे भाईजी की पहचान बम्बई के मारवाड़ी, गुजराती व अन्य सम्भ्रान्त समाज में भी हुई। उनकी संगत से भाईजी को यह बात समझ में आई कि व्यापार तो व्यापार ही रहेगा, वह उद्योग यानि इंडस्ट्री का मुकाबला नहीं कर सकता। बहुत ऊँचे उठना हो तो उद्योग में कदम रखना पड़ेगा। टेक्सटाइल मिलों का काम रोज देखते ही थे। उनके मालिकों से भी मित्रता थी। व्यापार में धन बरस रहा था, पैसा लगाने की क्षमता बन गई थी। सो दादाजी को राजी कर के उद्योग की शुरूआत भाईजी ने की। ताड़देव में एक ‘सूर्योदय मिल’ थी, जो आग से जलकर खाक होकर बन्द पड़ी थी। उसे लेकर लूम चलाने की शुरूआत की।
फिर नई आइडिया आई कि कपड़े का सबसे सस्ता प्रोसेस है कैलेण्डरिंग, वह शुरू किया जाय। पॉवरलूम का काम बहुत मारवाड़ी करने लग गये थे, जिसके बड़े केन्द्र थे भिवण्डी, इचलकरंजी आदि। उनको कैलेण्डरिंग के प्रोसेस के लिये मिलों की आजिजी करनी पड़ती थी। तो भाण्डुप में एक बड़ी जमीन ली गई और पॉवरलूम वहां शिफ्ट हो गई। उसे संभालने की जिम्मेदारी भाईजी ने जगदीशभाईजी व जयकृणभाईजी को दी।
पूरे ग्रुप के फाइनेंस का काम लक्ष्मीनारायणभाईजी को दिया गया। भाईजी ने सभी व्यापार और उद्योग को नियमित खुद न देखकर, छोटे भाइयों के जिम्मे कर दिया था और खुद लॉंग टर्म की बातों में ही लगे रहते थे। अगला उद्योग भाईजी ने शुरू किया, पर्मानेन्ट मेग्नेट्स लि.। यह भी एक बीमार कम्पनी थी। इसे स्थापित किया था, मुम्बई के मुख्यमंत्री श्री मोरारजी भाई के पुत्र श्री कान्तिभाई देसाई ने। इटली का कॉलेबोरेशन था और टेक्नॉलॉजी थी- चुम्बक यानि मेग्नेट बनाने की। उन्होंने श्री मदनमोहन रुइया जी को बेच दिया पर उनसे भी न चली। परिवार ने स्वीकृति दी और १९६० में भाईजी ने यह कम्पनी खरीदकर चलाना शुरू किया। इसे भाईजी ने खुद बहुत साल तक देखा और इसमें भी अच्छी कमाई हुई। बाद में इसको भी छोटे भाई श्यामसुन्दर को सौंप दिया।
तीसरे उद्योग की बात आई जब छोटे भाई श्यामसुन्दर ने आइ आइ टी खड़गपुर से बी टेक मैकेनिकल इंजिनियरिंग १९६० में पास की। पढ़ाई पूरी करके श्यामसुन्दर भाईजी ने जर्मनी में बाहोल्जर कम्पनी में १२ महीने की ट्रेनिंग ली। उसी समय एक और नये उद्योग को ढूंढने के लिये भाईजी ने वर्ल्ड टूर का प्लान किया। उन दिनों विदेश यात्रा एक बहुत बड़ी घटना मानी जाती थी। जीवन में एक बार हो गयी तो दुबारा हो या न हो। अतः बिजनेस और टूरिज्म का मिलाजुला प्रोग्राम बनाया। टूरिज्म कोई अकेले करने की चीज तो है नहीं, इसलिये भोजाईजी को साथ ले चलने का तय हुआ। पर परिवार के खर्च पर उनको कैसे ले जा सकते थे? सो उनकी टिकट और उनके कारण जहां जो भी एक्स्ट्रा खर्च लगेगा, वह पर्सनल होगा, इस आधार पर उनके साथ यात्रा हुई। आज की तरह घड़ियां तेजी से नहीं चलती थीं। पूरी दूनियां देखनी है तो समय तो लगेगा ही। सो चार महीने के ‘अल्प’ समय में दोनों सैलानियों ने विश्वयात्रा की। एथेन्स, मिलानो, जर्मनी, फ्रांस, हॉलेंड, इंगलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, कनाडा, सैनफ्रांसिस्को, होनोलूलू, जापान आदि देशों के भ्रमण का आनन्द लिया। विदेशी चीजों की खरीदी की तो साथ ही इतने बडे परिवार के सभी लोगों के लिये भी कुछ न कुछ खरीदी की।
इसी ट्रिप में श्यामसुन्दरभाईजी उनसे आ मिले और कई विदेशी कम्पनियों के साथ कौलेबोरेशन की बातें की। आखिर स्वीडन की कम्पनी बाहको के साथ हेण्डटूल मैन्यूफेक्चरिंग के लिये कॉलेबोरेशन का एग्रीमेन्ट फाइनल हुआ। नासिक में १९६७ में बाहको तापड़िया टूल्स लि़., बाद में नाम बदल कर ‘तापड़िया टूल्स लि़.’ का कारखाना शुरू हुआ। इसमें शुरू में दोनों भाईजी लगे पर यह दोनों के लिये बहुत भारी पड़ रहा था इसलिये पीएमएल को श्यामसुन्दर भाईजी ने संभाला और श्रीराम भाईजी ने टीटीएल को। सबसे छोटे जयप्रकाश ने बी टेक कर ली तो उसे भी पहले पीएमएल में श्यामभाईजी के मातहत लगाया गया। पर इंजीनियरिंग की पढाई के बाद उनका मन व्यवसाय में न लगता था| वे विदेश जा कर नौकरी करना चाहते थे। बड़े भाइयों से कहने की उनकी हिम्मत न पड़ती थी। पर काम में उनके मन न लगने को श्रीराम भाई जी भाँप लिया। एक दिन उन्हें अपने पास बुलाया और बात की। जयप्रकाश भाई जी का मन जान कर उन्होंने उन्हें विदेश जाने की सहर्ष अनुमति दी| कहाँ तो लगता था कि अब घर में तूफ़ान आने वाला है, पर हुआ उल्टा। भाई जी ने छोटे भाई के विदेश जाने का प्रबंध करवाया। कालांतर में जयप्रकाश भाई जी अमेरिका में सेटल हो गए।
उद्योग में भाईजी की मेनेजमेन्ट की स्टाइल कुछ अलग थी। अपने मातहत सीनियर जूनियर सभी कर्मचारियों को वे अपना पारिवारिक सदस्य मानते थे। उनके निजी सुखदुख में शामिल होते थे। इस कारण सभी के मन में इतना गहरा सम्मान होता था कि यदि किसी ने नौकरी छोड़ भी दी तो भी भाईजी से रिश्ता आजीवन रखता था।
उद्योग की समस्याओं को सुलझाने के लिये उनकी स्टाइल थी, सबके साथ मीटिंग करके एकमत बनाना। यह बड़ा लम्बा घण्टों चलने वाला प्रोसेस था जिसमें सब थक जाते थे पर भाईजी के पास थकावट का नामोनिशान नहीं होता था। रात को १० या ११ बजना मामूली बात थी। सबके लिये घर से नाश्ता आता था। पर उस निर्णय में जो अन्त तक असहमत होते थे उनकी भी आदर के कारण या थक जाने के कारण सहमति हो जाती थी। यानि विरोध करने वाला भी बहुमत को स्वीकार कर अपना विरोध वापिस ले लेता था। एकमत भले न हो पर कॉन्सेन्सस बनाकर गाड़ी आगे बढ़ती थी।
लेबर प्रॉब्लम हल करने की भी उनकी विलक्षण स्टाइल थी। पहले तो कई-कई बार खूब लम्बी मीटिंग करना। हल भले न निकले पर बातचीत टूटे नहीं। कौन सही है और कौन गलत यह मायने नहीं रखता। बॉटम लाइन यह थी कि सेटल करना है। यदि कोई बहुत नाजायज मांग लेकर अड़ जाय तो उसकी उस मांग को जितना कम नाजायज करा सको, उतना कर लो और फिर मान लो। हड़ताल या लॉक आउट की स्थिति आने नहीं देना चाहिये। लेबर हार गये और उनको मजबूर होकर अपनी मांग छोड़नी पड़ी, यह आपके हित में नहीं है, बल्कि उनको लगना चाहिये कि हम जीत गये।
परिवार बड़ा हो रहा था। कामकाज में काफी सदस्य आ गये थे। भाईजी का मानना था कि एक समय ऐसा आता है जब परिवार के हर सदस्य का स्वविकास उतना नहीं हो पाता। भाईजी ने कामकाज में भाइयों को स्वतन्त्र करने की शुरूआत की। लादूरामजी के तीन बेटों के १५ बेटे थे। वे एक एक कर अलग हुए और कुछ अलग अलग कम्पनियों के छोटे ग्रुप बन गये। हालांकि अलग होने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होती पर तापड़िया परिवार इस मायने में सौभाग्यशाली रहा कि परिवार के ही बड़ों की मध्यस्थता से हर सेपरेशन आखिर बिना तनातनी के हो गया। इसका श्रेय परिवार के बड़ों को तो है ही जिसमें श्रीरामभाईजी की मुख्य भूमिका रही, साथ ही उन सदस्यों को भी है जिन्होंने १०० प्रतिशत न्याय के लिये अडिग होने के बजाय पारिवारिक प्रेम सामंजस्य को अधिक महत्व दिया। आज पूरे जगन्नाथ तापड़िया परिवार यानि चारों दादाजी का परिवार जितना सुदृढ़ प्रेम डोर में बंधा है, वह समाज के सामने एक अद्भुत मिसाल है। सुख के लिये धन चाहिये पर पारिवारिक प्रेम न हो तो धन की वर्षा होते हुए भी सुख नष्ट हो जाता है।
व्यापार अलग होने के साथ रहने के घर भी अलग होते गये, बढ़ते गये। आज लादूरामजी परिवार के १८ फ्लैट बम्बई में हैं। बम्बई में हर फ्लैट जरूरत जितना ही या उससे भी कुछ कम ही होता है इसलिये हर घर में लड़के का विवाह होते ही कमरा कम पड़ जाता है।
नई नई चीजों का भाईजी को हमेशा शौक रहा। परिवार में हर नई चीज की खरीद की पहल उन्होंने की। कार, ऑटोमेटिक ग्रामोफोन रेडियो, टेप रिकॉर्डर, (१९६३), कैसेट प्लेयर (१९७२), टीवी (१९६६), कैमेरा (१९५१) विडियो कैमेरा (१९६१), ८ एमएम प्रोजेक्टर (१९६३), एसी (१९५९) वॉशिंग मशीन (१९६५), आटा पीसने की चक्की (१९६४), ये सब नई टेक्नॉलॉजी की चीजें घर में भाईजी ही पहले लाये। विदेशी कार फोर्ड (१९६७) भी उस जमाने में रईसी का चिन्ह था। सिनेमा का जबरदस्त शौक। शायद ही कोई नया सिनेमा छूटा होगा। एक ही सिनेमा को ५ या १० बार देखना भी सामान्य था। एक साल तो १०० सिनेमा का रेकॉर्ड बनाया। नाटक देखने भी जाते थे।
ताश हर रविवार को, घर पर परिवार के हमउम्र सदस्यों के साथ सुबह से शाम तक जमती, जिसमें घनश्यामकाकाजी, डूंगरकाकाजी, बजरंगकाकाजी, महावीरकाकाजी, गोपालकाकाजी, मदनभाईजी आदि मुख्य थे। ताश में एकमात्र खेल स्वीप ही सालोंसाल खेला गया। पर पैसे लगाकर खेलने पर हमेशा प्रतिबन्ध रहा। उन दिनों पिकनिक का भी क्रेज़ था। साल में १२ बार दिन भर की पिकनिक होती। बम्बई के बाहर की झीलों के पास पिकनिक स्पॉट होते थे, जैसे वैतरणा, तानसा, विहार, तुलसी पवई। इसके अलावा जुहू बीच, आरे कॉलोनी आदि भी थे। कारों में ठसाठस भर कर सहगल पंकज के गाने गाते हुए जाने का रिवाज़ था। एम्बेसेडर कार में १२ जनों का भर कर जाना आम बात थी। वहां जाकर चटाई बिछाकर बैठकर ताश खेलना या गपशप करना। खोखो, रूमाल आदि खेल खेले जाते थे और घूम फिर कर कड़ी भूख लगने पर घर का लाया आम सेण्डविच आदि नाश्ता खाते थे।
साल में ५-७ बार ऐसी पिकनिक होती थी, जिसमें रात भी बाहर बिताना होता था, जैसे महाबलेश्वर, पंचगनी, लोनावला, माथेरान, खंडाला आदि। वहां खुद भोजन पकाना भी आनन्द का हिस्सा था।
भाईजी खुद तो बहुत कम खेल खेले। शायद जसवन्तगढ़ में वॉलीबॉल खेले होंगे। पर बम्बई में क्रिकेट देखने का गज़ब का शौक था। उन दिनों ५ दिनों के टेस्ट मैच बम्बई में ही होते थे। उसकी टिकटें मंगाकर दिन भर पिकनिक सा माहौल बनता था। सबके लिये टिफिन भर कर ले जाते थे। क्रिकेट का शौक अन्त तक कायम रहा। हालांकि बाद में टीवी पर ही देखते थे।
संगीत का गहरा शौक था। शाास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम भी और फिल्मी गीतों के कार्यक्रम भी। अन्त तक यह आदत रही कि जहां दीखा, संगीत की टेप / सीडी खरीद ली। भले बाद में उसे सुनने का समय न मिले। खुद गाने का भी शौक गज़ब का था। घर पर कई बार संगीत सन्घ्या होती थी जिसमें भाईजी को गाने के लिये आग्रह नहीं करना पड़ता था। उनकी खास पसन्द के भजनों को, मारवाड़ी गीतों को, देशभक्ति के गीतों को उन्होंने टाइप करवा कर कॉपियां वितरित की थीं। मारवाड़ी कविताओं के शीर्ष कवि विमलेश को बहुत प्रोत्साहन दिया, घर पर काव्यगोष्ठी रखी।यही बात किताबों पर लागू थी। स्टॉल दीखने पर खरीदे बिना रहा नहीं जाता था। घर के ऑफिस में पूरा कमरा किताबों की लाइब्रेरी बना हुआ था। उन पुस्तकों को पढ़ने का समय कुछ मिला, कुछ नहीं मिला। प्रेमचन्द, शरत साहित्य, राजस्थानी साहित्य, काव्य, फिल्मी गीत आदि आदि से लाइब्रेरी से भरी पडी थी ।७५/४५/३३ आरपीएम रिकॉर्ड का जमाना आया तो जमकर रिकॉर्ड खरीदी। कैसेट का जमाना आया तो जमकर कैसेट खरीदी। सीडी का जमाना आया तो जमकर सीडी खरीदी। भाईजी का ऑफिस इन सारी खरीदी की विशाल लाइब्रेरी था।
यात्रा का शौक कम नहीं था। कुछ भोजाईजी के साथ और कुछ परिवार के छोटे-बड़े ग्रुप के साथ अनगिनत यात्रायें कीं। दादाजी के साथ बृजयात्रा, बापूजी के साथ द्वारका, सोमनाथ, ऐलोरा अजन्ता, मां के साथ वृन्दावन, जयप्रकाश के साथ तिरुपति व दक्षिण के मन्दिर, बहन बहनोई जयप्रकाश छाया के साथ चारधाम, भोजाईजी के साथ डलहौजी, कुलू मनाली, नैनीताल रानीखेत। एक महीने काश्मीर में श्रीनगर गुलमर्ग सोनमर्ग आदि। बर्मा में पांच दिन जिसमें विपश्यना भी की और गुरु सयाजी ऊ बा खिन के भी दर्शन हुए व चर्चा हुई। हॉंगकॉंग, थाईलैंड, पोलैंड की भी यात्रा हुई।
खानेपीने का भी शौक पूरा था। मिठाई नमकीन जंक फूड किसी भी चीज को न खाने की कसम नहीं थी। खाते सब खाते थे पर मात्रा में संयम नहीं खोते थे। आधुनिक डिशेज़ जैसे पिज्जा, पास्ता बर्गर आदि भाईजी को भाते तो नहीं थे पर बच्चों का मान रखने के लिये थोड़ा सा खा लेते थे। भारतीय बानगी के स्वाद के ऊँचे पारखी थे। किस चीज में क्या ठीक है और क्या कमी है इसपर पूरी विस्तृत व्याख्या दे सकते थे और देते भी थे। संयुक्त परिवार में विवाह तो आये दिन होता रहता था। उसमें हर एक मेनू के बारे में उस महाराज के साथ लम्बी मीटिंग चलती थी। कार्यक्रम के बाद में क्वालिटी फीडबेक भी देते थे। कई पुरानी आउटडेटेड मिठाइयों को फिर से इज्जत दिलवाने का काम भाईजी ने किया। बादाम की कतली में कौन सी बादाम का उपयोग हो। कैसे भिगोना, कैसे पीसना, कैसे सेकना और किस साइज़ की काटकर बनाना। जलेबी की रस्सी कितनी पतली हो, साइज़ क्या हो, तलने में कितनी कड़क हो, चाशनी में केसर इलायची कितनी हो। पिस्ता बुरकाकर कैसे पेश किया जाय, इसकी ट्रेनिंग रसोइया महाराज को देते देखा है। हर चीज में केसर डालने से उसका स्वाद और इज्जत बढ़ जाती है, इस थियरी के जन्मदाता उनको कहें तो अतिशयोक्ति नही होगी।
गृहिणियां रसोईघर में पूरे समय जुटी रहें, भाईजी को यह पसंद नहीं था। वे उनको टीवी पर सिनेमा देखने बिठाते थे| घर के आदमियों को उनका सन्देश था कि महिलाओं का हाथ बटाएं। एक बार किसी ने उन्हें बताया कि आज ८ मार्च महिला दिवस है। उन्होंने कहा, आज महिलाएं आराम करेंगी और पुरुष खाना बनाएंगे। वे खुद भी रसोईघर में काम करने आए। बाद में यह परम्परा बन गई। आज तक इसका उल्लंघन नहीं हुआ। घर की महिलाओं का वे बाहर की महिलाओं जितना ही सम्मान करते थे और सबको यही सीख देते थे। उनकी धाक के कारण कोई भाई अपनी पत्नी से ऊंची आवाज में बात नहीं करता था| कुल मिलाकर भाईजी ने समय-समय पर उपलब्ध सारे सांसारिक भोगों का उपभोग किया पर साथ ही ईशोपनिषद का यह मन्त्र भी अपने जीवन में चरितार्थ किया ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’।
हालांकि यह संस्मरण भाईजी के बारे में है पर इस बीच में दादाजी लादूरामजी के बारे में कुछ बताना इसलिये संगत है कि भाईजी पर सबसे अधिक प्रभाव किसी का पड़ा है तो दादाजी का।परदादाजी जगन्नाथजी जिन्होंने जसवन्तगढ़ गांव को बसाया, बड़े आत्मसम्मान वाले व्यक्तित्व थे पर कामकाज़ में वे असफल रहे। सट्टे के व्यसन के कारण सिर पर बड़ा कर्ज इकट्ठा कर लिया। चार सन्तानों के घर में कमाई का कोई साधन नहीं था। सबसे बड़े बेटे लादूराम पर १४ साल की उम्र में इस कर्ज को उतारने, और अपने व अपने तीन छोटे भाइयों, शिवचन्दराय, सूरजमल व गणपतराय के परिवारों के भरण पोषण की जिम्मेदारी आ पड़ी।
जहां पूरा राजस्थान ही पिछड़ा, गरीब व अकाल भुखमरी से पीड़ित था, वहां छोटे से गांव जसवन्तगढ़ में व्यापार का स्कोप नहीं के बराबर था। पर जब जिम्मेदारी आ पड़ती है तो आदमी की छिपी हुई प्रतिभा को उभार देती है। सो दादाजी लादूरामजी ने सोचकर यह निष्कर्ष निकाला कि ‘दिसावर’ जाकर ही कमाई हो सकेगी। तय करके उन्होंने अपना भीष्मसंकल्प जाहिर कर दिया कि ‘जद ताणी करजो नईं उतार द्यूं बड़ ताणी पाछो कोनी बावड़ूं।’(जब तक कर्ज़ नहीं उतार दूंगा, तब तक वापस नहीं लौटूंगा।)
ऊँट पर बैठकर मेड़ता और फिर रेल से दिल्ली, फिर दिल्ली से कलकत्ता, फिर कलकत्ते से आसाम। बड़ी लम्बी कठिन यात्रा करके युवा लादूरामजी कलकत्ता होते हुए आसाम के डिब्रूगढ़ शहर पहुंचे। उनके जैसे कई मारवाड़ी उद्यमी आज से २००-२५० साल पहले अपनी जन्मभूमि से हमेशा के लिये विदा होकर भारत के दूरदराज़ कस्बों में वहीं के होकर रह गये थे। वे राजस्थान के अपने बन्धुओं को, जो नये-नये वहां पहुंचते थे, कामकाज जमाने में मदद करते थे। और इस ट्रेनिंग प्रोसेस में उन्हें अपने भरोसे का सहायक भी मिल जाता था। लादूरामजी को भी किसी अग्रवालजी ने कपड़े की दुकान में नौकरी दी। नौकरी में व्यापार का हॉर्स सेंस, इन्ट्यूशन, अटकल, विश्वसनीयता और मेहनत के बल पर मालिक के व्यापार को खूब बढ़ाया। पिता के माथे पर चढ़ा कर्ज चुका कर लादूरामजी पूरे ५ साल बाद छुट्टी लेकर जसवन्तगढ़ लौटे। दादीजी सुरजूदेवी ने भी इतने साल युवावस्था में अपनी विरहव्यथा को मन में ही रखकर घर व बच्चों को सम्भाला। उनकी इस महान तपस्या को एक्नॉलेज करने का न रिवाज़ था, न अपेक्षा थी। जब उनके वापिस काम पर लौटने की बात आई तो उनकी माताजी ने बेटे लादूरामजी के कमजोर शरीर को देखकर, नाराज होकर कह दिया कि अब मैं लादूरामा को नौकरी के लिये नहीं भेजूंगी।
जसवन्तगढ़ के पास नोखा है। वहां के रामचन्द्रजी तापड़िया लादूरामजी की प्रतिभा और ईमानदारी के कायल थे। उन्होंने सुझाव दिया कि इस लड़के को खुद का कामकाज शुरू करने के लिये कहो। पर कामकाज के लिये रुपया कहां से आयेगा? रामचन्द्रजी ने सुजानगढ़ के बड़े नामी सेठ कनकमलजी लोढ़ा से बात की कि कलकत्ते में कपड़े का काम शुरू किया जाय, आपकी व जगन्नाथजी तापड़िया की भागीदारी में, जिसे देखेगा लादूराम, जिसमें रुपया पूरा आपका लगेगा पर भागीदारी १४ : २ होगी। लोढ़ाजी ने पूछा यदि घाटा हुआ तो? रामनाथ जी को लादूराम पर इतना विश्वास था कि उन्होंने गारन्टी दी। बात तय हो गयी और लादूरामजी फिर अपनी कर्मभूमि कलकत्ता के लिये शुभ मुहूर्त देख कर रवाना हो गये। कामकाज चला, बड़े जोरों से चला और फिर कलकत्ते में लादूरामजी की अतिकुशल व्यापारी के रूप में धूम मच गयी। लोढ़ाजी भी अपने भागीदार से बड़े खुश थे। लादूरामजी ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की बात की जो लोढ़ाजी ने मान ली। उस हिस्सेदारी को बढ़ाने में दादाजी ने अपने तीनों छोटे भाइयों को भी भागीदारी दिलवा दी। धीरे धीरे लोढ़ाजी का हिस्सा कम होता गया, तापड़िया भाइयों का बढ़ता गया और आखिर में पूरा बिजनेस उनके हाथ आ गया।
लादूरामजी का हृदय अतिविशाल था। उनका अपनेपन का दायरा, अपने तक व अपने भाइयों के पूरे परिवार तक ही सीमित नहीं था। पूरा जसवन्तगढ़ गांव उनका अपना था। एक विशाल वटवृक्ष की तरह अनगिनत परिवार उनकी छाया में पले, समृद्ध हुए या मुसीबत से निकले। उन्होंने एक-एक करके अपने तीनों छोटे भाइयों को कलकत्ते बुलाकर उनको पहले अपने साथ भागीदारी में काम में लगाया फिर स्वतन्त्र काम में स्थापित कर दिया। फिर अगली पीढ़ी को भी काम में प्रवृत्त किया। कामकाज के उनके उसूलों को सबने आत्मसात किया जिससे बाज़ार में, समाज में साख बनी रहे और घाटे से भी बचे रहें।
दादाजी के देहावसान के समय सारे गांववालों ने जिस शानदार तरह से उनको बिदाई दी, वही उनके व्यक्तित्व का परिचायक है।
ईश्वर की अनुकम्पा से जगन्नाथजी तापड़िया का परिवार बढ़ते बढ़ते करीब १५० सदस्यों का हो गया था। बहनों, बेटियों, भानजे, भानजियों को जोड़ेंगे तो शायद ३५० हो जायेंगे। इनमें से अधिकतम देरसबेर आकर बम्बई में ही स्थायी हो गये थे। दादाजी लादूरामजी से जो संस्कृति छोटे बड़ों को सभी को विरासत में मिली थी यानि अपनेपन का दायरा पूरे परिवार तक फैलाये रखने और उसे जीवित रखने का सक्रिय प्रयास करने के कई उपक्रम बड़े भाईजी और उनके समवयस्क काकाजी व भाइयों ने मिलकर सोचे। उनमें से कुछ विशेष उल्लेखनीय ये हैं-
परिवार
भाईजी की दिनचर्या
भाईजी की दिनचर्या इस प्रकार थी। सुबह ८ से १० के बीच देरी से तब उठना, जब नींद पूरी हो जाये। नींद पूरी करना भाईजी के उत्कृष्ट स्वास्थ्य का एक मुख्य हिस्सा व कारण था। नित्यकर्म पूरा करने में ११ से १२ बज जाते थे जिसमें आसन, प्राणायाम, मालिश और नाश्ता भी शामिल थे। फिर शुरू होता था काम का लम्बा सिलसिला। भाईजी का ऑफिस बेडरूम से लग कर था। अतः समय की कोई सीमा नहीं थी, भले ही रात के १-२ बज जायें। भाईजी ने कभी खुद कम्प्यूटर पर काम नहीं किया पर करवा कर लेना आता था। कम्प्यूटर काम के लिये गणेश महतो और अन्य ऑफिस काम के लिये सन्तोष झा। ड्राफ्टिंग में परफेक्श्न भाईजी का पैशन था। पहले हाथ से लिखकर देते थे, फिर टाइपिंग की गलती सुधारने का लम्बा सिलसिला। चार-पांच बार परिष्कृत करके प्रिन्ट आउट निकालना नॉर्मल था।
भले ही सब कुछ कम्प्यूटर में था पर भाईजी कागज के रिकॉर्ड पर निर्भर रहना पसन्द करते थे। अतः उनका अति विशाल सिस्टेमेटिक फाइलिंग सिस्टम बनाया हुआ था। यह जगप्रसिद्ध था कि यदि कोई पेपर भाईजी के सुमेरु पर्वत रिकॉर्ड में आ गया तो वह निश्चित भाईजी के पास २०-३० साल बाद भी मिल जायेगा।
परिवार का विभाजन
परिवार जैसे-जैसे बड़ा होता है, वैसे-वैसे उनको छोटे भागों में बांटना पड़ता है। यह अलग होने की प्रक्रिया तीन स्तर पर होती है।
भाई-भाई का अलग होना दुनिया में होता आया है। इस प्रक्रिया से हर परिवार को गुजरना पड़ता है पर इस नाजुक प्रक्रिया को सही समय पर, सही तरह से करने के लिये जो अनुभव और समझ यानि विज्डम जरूरी है, वह अधिकतर नहीं होती। विडम्बना यह है कि मातापिता यह भी नहीं समझते कि जिस तरह की समझ इसके लिये चाहिये, वह मुझमें नही है। नतीजा यह होता है कि समय पर इलाज नहीं होता। कैंसर फैल जाता है और फिर जो सर्जरी करनी पड़ती है, उसमें काफी खून बहता है, अंग काटते पड़ते हैं और जीवन भर घाव रह जाता है।
इस प्रक्रिया की गहरी समझ भाईजी ने अपने बड़ों के अनुभव से, सम्बन्धियों के, समाज के परिवारों को देखकर काफी हासिल कर ली थी। भाईजी ने अपने अनुभवों के आधार पर यह सिद्धान्त निकाला कि यदि अलग होने की जरूरत महसूस होने लगी तो समझ लो कि अलग होने में देर हो चुकी है, यानि अब यह प्रक्रिया कठिन होगी। प्रेम से, शान्ति से नही होगी। यू आर टू लेट। वही सेपरेशन सही है, जिसकी जरूरत बिलकुल महसूस नहीं हो रही हो। जिसमें अलग होते समय प्रेम के आंसू बहें, न कि रिलीफ महसूस हो। हर पिता का महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि वह अपनी मौजूदगी में अपने लड़कों को बिना कारण पहले आर्थिक रूप से अलग करे, फिर अलग अलग रहने की व्यवस्था करे और फिर कामकाज में अलग करे। वह सेन्स करे कि अब आगे तनाव शुरू हो सकता है। इस थियरी को भाईजी जहां भी सही माहौल देखते, वहां समझाते थे।
लादूरामजी दादाजी ने पहले अपने तीनों भाइयों को अलग किया। फिर अपने तीनों बेटों के घरों को। पर तीनों का कामकाज साथ ही था। अब हमारे पिताजी व दोनों काकाजी की बारी थी कि वे अपने १५ बेटों के कामकाज को अलग करते। पर यह काम भाईजी ने काकाजी की मदद से किया। इसमें कई साल लगे। भाईजी ने हम सातों भाइयों के आर्थिक रूप से अलग हो जाने की बात भी तब छेड़ दी, जब ऐसा कोई सवाल ही नहीं था। मैं जो सबसे छोटा था, वह तो अभी पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाया था और सेपरेशन की एबीसीडी भी नहीं जानता था। मेरे लिये तो यह बालविवाह जैसा था। नाम के लिये सेपरेशन पिताजी ने किया पर सब समझ रहे थे कि यह सब भाईजी ही करवा रहे हैं। बाहरी परिवार को अलग करने का रोल एक बात है और खुद भी जिसमें एक हिस्सेदार हो उस केस में खुद को निष्पक्ष रखना और सब को निष्पक्ष दीखना बहुत कठिन है। उसमें खुद कहीं कहीं घाटा भी सहन करना पड़ता है और वह भाईजी ने किया।
भाईजी ने अपने खुद के परिवार और सगे सम्बन्धियों के परिवारों में इस प्रक्रिया में कई बार आगे बढ़कर हिस्सा लिया। अपने बच्चों, अपने भाइयों के बच्चों को व्यवसाय में अलग कर और अलग अलग निवास की व्यवस्था हो जाने के बाद , आखिर भाईजी स्वयं बिजनेस से रिटायर हो गए। उन्होंने यह प्लान कर लिया था कि अब वे अपना पूरा समय माहेश्वरी समाज, जसवन्तगढ़, परिवार की समस्याओं, विपश्यना के अध्यात्म और दान के काम में लगायेंगे।
पर सेपरेशन की इस थियरी में एक अपवाद भाईजी ने खुद अपने जीवन में किया। आर्थिक रूप से अलग होने के बावजूद भाईजी, श्यामसुन्दर भाईजी का चार लोगों का परिवार आजीवन एक साथ रहा। उनके लिए घर में चौबीस घंटे साथ रहने वाले एक सेवक और एक सेविका की नियुक्ति की गई। दोनों भाई के बच्चे उनके पास आना-जाना लगातार करते थे। जयप्रकाश भाई जी साल में एक बार महीने-दो महीने के लिए आते थे। उनके लिए रहने की अलग व्यवस्था की जाती थी।
बम्बई का मारवाड़ी समाज जो मुख्यतः व्यापारी था, बढ़ता जा रहा था और आवश्यकता महसूस हो रही थी कि वे व्यापार के अलावा समाज के स्तर पर आपस में मिलेंजुलें। इसके लिये माहेश्वरी, अग्रवाल ओसवाल समाज सबने अपनी संस्थायें स्थापित कीं। भाईजी भी आकर्षित हुए और नवस्थापित माहेश्वरी प्रगति मण्डल के सक्रिय सदस्य बने। शीघ्र ही लोगों ने भाईजी की नेतृत्व क्षमता को पहचान लिया और फिर तो मण्डल और भाईजी आजीवन राधामाधव हो गये। भाईजी की सांस-सांस में मण्डल बसा था। हर समाज में कुछ सक्रिय लोग इस जुनून को साथ लेकर जीते हैं कि समाजसेवा का काम जोरों से हो। उसी का परिणाम सामने आता है। समाजसेवा का काम भाईजी ने खूब किया भी और खूब प्रोत्साहन भी दिया।
दूरदर्शी, मनीषी वह होता है जो भविष्य के गर्भ को देख पाता है। भाईजी ने पूरे भारत में चल रहे माहेश्वरी समाजों और अन्य संस्थाओं के अन्दर चल रही उठापटक और राजनीति का सूक्ष्मता से अध्ययन किया और उसके मूल कारण व निवारण पर चिन्तन किया। मानवीय कमजोरियों विशेषकर मान, अपमान और अहंकार का टकराव कैसे संस्थाओं की ऊर्जा को समाप्त कर देता है, कैसे गुट बन जाते हैं और उनका लक्ष्य एक दूसरे को गिराना बन जाता है, कैसे सज्जन थक कर संस्था में निष्क्रिय हो जाते हैं और राजनैतिक मानसिकता वाले लोग संस्था पर हावी हो जाते हैं- यह सब देखा समझा। इन सब के निचोड़ के रूप में भाईजी ने कुछ अतिमूल्यवान प्रभावशाली प्रेक्टिकल उपाय / पॉलिसी / सिद्धान्त निकाले।
इन मूलमन्त्रों पर सबका विश्वास जमाने में भाईजी ने सालों मेहनत की। बीचबीच में फिर भी कार्यकर्ताओं में बेसब्री उभरती रहती थी। आखिर इस लम्बी प्रक्रिया का एक अद्भुत परिणाम, अद्भुत आदर्श सारे भारत के माहेश्वरी समाज को देखने को मिला। वृहद् बम्बई में करीब ६००० सदस्यों की भारत की सबसे बड़ी संस्था होने के बावजूद माहेश्वरी प्रगति मंडल में विरोध की राजनीति नहीं के बराबर रही। यहां तक कि सालों तक इलेक्शन हुआ ही नहीं। भाईजी ने अगणित कार्यकर्ताओं को सालों तक गाइड करके तैयार किया। इससे मण्डल की एक संस्कृति बन गयी है जिसका स्थायी लाभ समाज को मिल रहा है। समाज सिर्फ समाज ही नहीं बल्कि एक परिवार है जो एक दूसरे के सुख-दुख के साथी हैं, यह भावना भाईजी ने सालों तक समाज में कूटकूट कर भरी
बम्बई के माहेश्वरी समाज में जो संस्कृति उपजी, वह अखिल भारतीय स्तर पर बिलकुल नहीं थी। माहेश्वरी महासभा बहुत पहले से ही राजनीति, गुटबाजी, प्रतिष्ठा और वैभव प्रदर्षन का अखाड़ा बनी हुई थी। आजादी के पहले और बाद में सादगी, सेवा, देशभक्ति का जो माहौल महामना श्रीकृष्णदास जाजू, विदर्भ केसरी बृजलालजी बियाणी, सेठ गोविन्ददास आदि माहेश्वरी महापुरुषों ने बनाया और समाज में जो चेतना फूंकी थी, वह कब की काफूर हो चुकी थी।
इस अखाड़े में जब भाईजी ने प्रवेश किया तो न केवल बड़े बड़े महारथियों का ध्यान आकर्षित हुआ बल्कि उन सीधे सच्चे कार्यकर्ताओं का भी, जो हाशिये पर थे या कर दिये गये थे। उनको भी पहली बार एक ऐसे व्यक्तित्व का दर्शन हुआ जो सादगी, सच्चाई, निस्पृहता की प्रतिमूर्ति था, जिसपर वे आंख बन्द कर भरोसा कर सकते थे। शीघ्र ही महासभा में भाईजी को पदाधिकारी बनाने की मांग उठने लगी। पर भाईजी तो राजनीति से कोसों दूर थे। आखिर भाईजी ने महामन्त्री पद स्वीकार किया, जिसमें काम अधिक था पर जो ताज था, वह कांटों का बना हुआ था। अन्त तक भाईजी महासभा में सक्रिय रहे।
जसवन्तगढ़
अपनी मातृभूमि के प्रति प्रगाढ़ प्रेम स्वाभाविक बात है। भाईजी ने भी गांव के उत्थान के लिये दशकों तक बड़ी सेवा की। जो भी अच्छी योजना सामने आई, चाहे हितकारिणी सभा हो चाहे गोशाला हो, भाईजी उसमें तनमनधन से जुड़ते ही थे। तापड़िया परिवार के औषधालय व लक्ष्मीजी मन्दिर का पुनर्निमाण, माताजी प्यारीदेवी के नाम पर विद्यालय की स्थापना आदि उपक्रमों में भाईजी की प्रमुख भूमिका रही। जीवन के अन्तकाल तक जसवन्तगढ़ सम्बन्धी हर काम में पूरे तापड़िया परिवार के सभी लोग भाईजी पर ही बोझ डालकर निश्चिन्त होकर बैठे रहते थे और भाईजी उस बोझ को सहर्ष स्वीकार करते थे।
विशिष्ट जुड़ाव
विपश्यना
‘एव्री ईवेन्ट इज़ एन अपॉर्चुनिटी’, यह कहावत भाईजी के लिये बड़े दिलचस्प तरीके से लागू पड़ी। बिजनेस और समाज कार्य में व्यस्त भाईजी की धर्म या अध्यात्म में न रुचि थी, न विश्वास। वे तो कर्मयोगी थे। इसी दौरान भाईजी के साथ सालों से दिनरात काम करने वाले दो तीन सामाजिक कार्यकर्ताओं की अकस्मात मृत्यु हो गयी। इसका भाईजी के दिल पर इतना गहरा आघात पड़ा कि उनको गंभीर डिप्रेशन हो गया।
It took a few decades for the Mandal to imbibe this working style standing on these three pillars of the policy. However, there used to be occasional impatience among the Karyakartas. At the end, the entire Maheshwari society of India got to see a wonderful result, a wonderful ideal of this long process. Despite being India's largest organization with about 6000 members in Greater Bombay, the politics of Opposition remained negligible in Maheshwari Pragati Mandal. Even elections did not happen for years.
जब ऐलोपेथी से फायदा नहीं हुआ तो दूसरे इलाजों का दौर शुरू हुआ। एक श्री भाटिया जी ने आसन प्राणायाम कराया जिससे कुछ रिलीफ मिलती थी पर डिप्रेशन मिटा नहीं। इसी दौरान एक मोतीलालजी चौधरी जो रंगून के भाईजी के पुराने व्यापारी मि़त्र थे, वे मिलने आये। उन्होंने बड़े प्रेमपूर्वक आग्रह के साथ बताया कि बर्मा से एक सत्यनारायणजी गोयनका आये हैं जो एक १० दिन का विपश्यना नामका साधना शिविर लगाने वाले हैं। जब आप सब प्रयत्न कर चुके हैं तो यह विपश्यना भी करके देखिये तो सही।
वही १० दिन भाईजी के जीवन की दिशा बदलने वाले साबित हुए। सत्यनारायणजी गोयनका गुरूजी का यह भारत में पहला बहुत कम लोगों का शिविर था जिसमें उनके सम्बन्धी और मित्र ही थे। पूरे मनोयोग से साधना की। और चमत्कार हुआ!!! महीनों पुराना डिप्रेशन १० दिन में गायब हो गया! शायद नियति यही चाहती थी कि भाईजी विपश्यना में लगें, जिसके लिये यह सब नाटक हुआ। उसी दिन से भाईजी विपश्यना से आजीवन जुड़ गये। यह भी कह सकते हैं कि आगे के जीवन में भाईजी जो अनेक आंधी तूफानों में अडिग अविचल रहे, हर समस्या के हल में शान्त तटस्थ रहकर सही मध्यम मार्ग पर चलते रहे, उसके पीछे विपश्यना खड़ी थी। तापड़िया परिवार में भी कइयों ने विपश्यना अपनाई, उसका मूल प्रेरणास्रोत भाईजी ही थे।
कुछ घटनाएँ
पहली - भाईजी के अपनी बुआ के बेटों से बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। आठ भाई थे वे । सुखी परिवार, जिनका आपस में पूरा प्रेम! भाईजी ने उनको प्यार से समझाया कि यही सही समय है जब तुम सब को अलग हो जाना चाहिये। वे सब हक्केबक्के रह गये। पर भाईजी कह रहे हैं तो जरूर समझदारी की बात होगी। ऐसा मानकर वे व्यापार में अलग हो गये। उस बात को कई दशक बीत गये पर वे आज तक इस बात को याद करके भाईजी के गुण गाते है कि भाईजी की बात मान लेने के कारण ही आज भी सभी भाइयों में और उनके बेटों और पोतों तक में अगाध प्रेम है।
दूसरी - समाजसुधार की हवा बह रही थी। बम्बई माहेश्वरी समाज के कर्णधारों ने मिलकर विवाह में हो रही पैसे खर्च करने की होड़ पर रोक लगाने के लिये नियम बनाये। इसमें एक था, चालीस से अधिक बाराती न ले जाने का। नियम समाज के पदाधिकारियों पर सबसे पहले लागू पड़ता है, यह घोषणा हो गयी। भाईजी ने भी नियम पालन का व्रत लिया। उनके रहते परिवार में सौ के करीब शादियाँ तो हुई होंगी। पर यह नियम कभी तोडा नहीं गया ।
तीसरी - भाईजी पेटा संस्था से जुड़े थे जो प्राणियों पर हो रही क्रूरता से बचाने वाली संस्था है। एक बार पेटा की तरफ से फोन आया। जुहू बीच पर करीब १५-२० अधमरे ऊंटों को पुलिस ने पेटा के कब्जे में दे दिया था जिनके मालिक उनकी दुर्दशा कर कमाई कर रहे थे। अब उन ऊंटों को राजस्थान ले जाकर ऐसे व्यक्तियों के ताबे में छोड़ना था, जो उनके प्राणों की रक्षा करे। यह प्रोजेक्ट बहुत भारी पड़ा। पर भाई जी ने इसे कर दिखाया।
चौथी - मण्डल में इलेक्शन न होकर सर्वमान्य सेलेक्शन की परम्परा सफलतापूर्वक स्थापित हो चुकी थी। इसमें वही नोमिनेशन आते थे जो तय कर लिये जाते थे। एक बार यह प्रक्रिया फेल हो गयी। किसी महानुभाव ने जिद पकड़ ली कि मैं नोमिनेशन भरूंगा ही। कई लोगों ने समझाकर देख लिया। आखिर भाईजी उनके घर पर गये। किस तरह से क्या बात हुई मालूम नहीं पर आखिर वे मान गये।
वसीयत
भाईजी ने अपनी वसीयत बहुत पहले से बना रखी थी। उसमें भी उन्होंने एक आदर्श उदाहरण स्थापित किया। उसके वे कुछ अंश जानने लायक हैं जिसमें भाईजी ने समाज के ऐसे चेरिटेबल कामों के लिये फण्ड दिया, जिससे स्थायी सुधार हो।
आयु के ८६ वें वर्ष में भी भाईजी का स्वास्थ्य उत्तम था। पर इम्यूनिटी तो उम्र पाकर कम होती ही है। भाईजी को किसी पारिवारिक समस्या के कारण से सर्दियों में राजस्थान जाना पड़ा। वापिस आये तो बुखार ले कर आये। कुछ दिन इलाज चला पर फायदा नहीं हुआ तो डोक्टर ने एंडोस्कॉपी बायोप्सी की। उसमें टीबी निकल आया। फिर जो कई महीनों तक इलाज चला उससे भाईजी पूरे ठीक हो गये। पर इम्यूनिटी तो कम हो ही गयी। और इसी बीच एक एक्स रे में उनके फेफड़े में एक बड़ा पैच दिखा। डॉक्टर ने बताया कि भाईजी को जिस बैक्टीरिया ने चंगुल में लिया हुआ है और किसी भी एण्टीबायोटिक का असर नहीं हो रहा है, वह नोकार्डिया नामका एक दुर्लभ बैक्टीरिया है जो बहुत कम, पर ऐसे ही लोगों को पकड़ता है जिनकी इम्यूनिटी बहुत कम हो। नोकार्डियोसिस ने फेफड़े को काफी जकड़ लिया था। अब एण्टीबायोटिक और नोकार्डियोसिस का निर्णायक महायुद्ध शुरू हुआ। ऑक्सीजन की नली के बावजूद बचे हुए फेफड़े से सांस लेना दिन पर दिन कठिन हो रहा था।
खबर पूरे परिवार में, सम्बन्धियों में, माहेश्वरी समाज में फैल गई तो अस्पताल में लोगों का तांता बंध गया। रोज की हेल्थ बुलेटिन निकालनी पड़ी। इस बीच भाईजी ने समझ लिया कि अब यह लड़ाई लम्बी नहीं चलेगी। इसलिये उन्होंने कुछ लोगों को बुलाकर अतिआवश्यक बचे हुए कामों के निर्देश देना चालू कर दिया। आखिर भाईजी ने अपना निर्णय ले लिया और डॉ माहेश्वरी को बुलाकर लिख कर कहा कि अब मुझे घर जाना है। बाहर खड़े हम सब के सामने यह यक्ष प्रश्न रखा गया। जब तक इलाज चलता है तब तक प्रयत्न नहीं छोड़ना चाहिये यह एक सामान्य मेडिकल नीति होती है। पर भाईजी की सिर्फ इच्छा नहीं थी, आदेश था। इसलिये वस्तुतः यह प्रश्न नहीं था, स्वीकार करने की औपचारिकता थी। सबसे कठिन था सुमनभोजाईजी को इस बारे में पूछना। पर ऐसा लगा कि उन्होंने भी इस क्षण के लिये खुद को कई दिन से तैयार करना शुरू कर दिया था। एक वीर पुरुष और उनकी वीरांगना का यह रूप हम सबने विस्मित श्रद्धावनत होकर देखा।
सबसे बात करके डॉ माहेश्वरी ने फिर अन्दर जाकर भाईजी को जाकर पूछा, ‘घर जाने का अर्थ आप समझ रहे हैं ना?’, भाईजी ने दृढ़ता से हां में सिर हिलाया।
२२ जुलाई की दोपहर एम्बुलेंस घर पहुंची। उसके पहले ही कमरे को आइसीयू में बदल दिया गया था। लेकिन उसी शाम शाम ७.१५ बजे भाईजी अपने इस जीवन का अन्तिम अध्याय का समापन करके अगली महायात्रा पर निकल गए ।
अब हमारे सामने महत् कार्य था भाईजी के अन्तिम संस्कार का। भाईजी ने इस विषय पर गहन चिन्तन करके दो पेज का प्रिन्टआउट हमें कई साल पहले दे रखा था। जीवन के इस अन्तिम अध्याय में भी उन्होंने समाज के सामने एक आदर्श स्थापित करने का मौका नहीं छोड़ा। इस पर कुछ लिखने के बजाय इसे ज्यूं का त्यंू शेयर किया जा रहा है।
इस लिखावट की भावना के अनुरूप सारा कार्य व्यवस्थित हो गया। पूरे समय सभी परिजनों ने असीम धैर्य का परिचय दिया और घर का वातावरण पूर्णतः शान्त व आध्यात्मिक रहा। पुरानी रूढिवादी रस्में छोड़कर प्रतीकात्मक व भावनात्मक रस्में ही पूरी की गयीं। शव यात्रा में अपेक्षा से काफी अधिक परिवारजन, सम्बन्धी व माहेश्वरी समाज के लोग उपस्थित थे। प्रार्थना सभा में भी बड़ी भारी उपस्थिति थी। यह उपस्थिति महज औपचारिकता की नहीं थी। यह उन लोगों की थी जिनके दिलों के किसी कोने में भाईजी बैठे थे। तापड़िया परिवार व मुम्बई माहेश्वरी समाज के युगपुरुष को सभी ने हृदय से श्रद्धांजलि दी। भाईजी मोक्ष नहीं चाहते थे। वे ऐसे कर्मयोगी थे जो स्वयं की मुक्ति को लात मारकर मानवमात्र की सेवा के लिये जन्मजन्मान्तर तक संसार के आवागमन के चक्र को सहर्ष स्वीकार करने की इच्छा रखते हैं।
हम खुद को अति सौभाग्यशाली मानते हैं कि हमें ऐसे भाईजी का आजन्म सान्निध्य मिला।
मेरे बड़े भाई साहब और भाभीजी मेरे लिए माता-पिता के समान थे। वर्ष 1956 में मैं बम्बई आया और छठी कक्षा में प्रवेश लिया। उसके बाद से मेरे पूरे जीवन का निर्माण उन्हीं के सान्निध्य में हुआ। मेरा बचपन, मेरी शिक्षा, मेरा विवाह, व्यवसाय में प्रवेश, मेरे बच्चों का जन्म, उनका बड़ा होना, उनके विवाह और यहाँ तक कि मेरे दादा बनने तक की पूरी यात्रा भाईजी के मार्गदर्शन और संरक्षण में सम्पन्न हुई। हम सभी उनके मार्गदर्शन के इतने अभ्यस्त हो गए थे कि वह हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गया था। सात भाइयों में सबसे छोटा होने के कारण मुझे सदैव बड़ों का आशीर्वाद मिलता रहा और मुझे आशीर्वाद देने वाले भी अनेक लोग थे।
बचपन से ही मैंने देखा कि चाहे व्यापार की समस्या हो, परिवार का कोई विषय हो या समाज से जुड़ा कोई प्रश्न—ऐसा लगता था मानो भाईजी का जन्म ही इन समस्याओं का समाधान करने के लिए हुआ हो।
जीवन की भागदौड़ में मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसा दिन भी आएगा जब भाईजी हमारे बीच नहीं रहेंगे। आज जब भी परिवार में कोई समस्या आती है, उनकी अनुपस्थिति गहराई से महसूस होती है।
उनके निधन के बाद असंख्य लोगों ने भाईजी के बारे में अपनी भावनाएँ और उनके साथ जुड़े अनुभव साझा किए। तभी मेरे मन में विचार आया कि यदि इन सभी विचारों और अनुभवों को संकलित नहीं किया गया, तो परिवार और समाज दोनों ही अनेक अमूल्य प्रेरणाओं से वंचित रह जाएंगे। मुझे यह भी लगा कि शायद मैं सौभाग्यशाली हूँ, जिसे लंबे समय तक भाईजी के व्यक्तित्व को बहुत निकट से देखने और समझने का अवसर मिला तथा लिखने की कुछ क्षमता भी ईश्वर ने दी। भीतर कहीं कोई अदृश्य प्रेरणा मुझे निरंतर आगे बढ़ा रही थी। इसलिए मैंने लिखना प्रारम्भ किया। लेकिन जैसे ही लेखन शुरू किया, मुझे एहसास हुआ कि यह कार्य उतना छोटा नहीं था जितना मैंने सोचा था।
तब तक वापस लौटने का कोई मार्ग नहीं था। परिवार और माहेश्वरी समाज को पता चल चुका था कि मैंने यह कार्य आरम्भ कर दिया है। अब आगे बढ़ते रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई अदृश्य शक्ति मुझे इस कार्य को पूरा करने के लिए प्रेरित कर रही हो। मुझे बिल्कुल अनुमान नहीं था कि इस लेखन में इतना समय लगेगा और इसके लिए मुझे कितनी ही रातें जागकर बितानी पड़ेंगी। मैंने सोचा था कि यह कार्य दो या तीन वर्षों में पूरा हो जाएगा, परन्तु इसे पूरा होने में पूरे नौ वर्ष लग गए। इस विलम्ब के लिए मैं सभी पाठकों से क्षमा प्रार्थी हूँ।
भाईजी को वास्तव में समझने के लिए उन्हें तीन रूपों में जानना आवश्यक है—उनके जीवन-वृत्तांत के माध्यम से, उनके द्वारा लिखे गए लेखों के माध्यम से तथा उन लोगों द्वारा लिखे गए संस्मरणों और श्रद्धांजलियों के माध्यम से जो उनके निकट रहे। यह पुस्तक इन तीनों पक्षों को एक साथ प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास है। यदि इसमें मुझे थोड़ी भी सफलता प्राप्त होती है, तो मैं स्वयं को धन्य समझूँगा।
यदि इस पुस्तक को पाठकों का स्नेह और सराहना प्राप्त होती है, तो उसका सम्पूर्ण श्रेय भाईजी के प्रेरणादायी जीवन को ही जाएगा।
— जयप्रकाश तापड़िया